समजशसतर और समजक परवरतन : जनजतय समज म समजक परवरतन क समजशसतरय वशलषण
Résumé fourni par la source
सारांश- सामाजिक परिवर्तन समाजशास्त्र की केंद्रीय अवधारणाओं में से एक है। समाज कोई स्थिर एवं अपरिवर्तनीय व्यवस्था नहीं है, बल्कि समय, परिस्थितियों, तकनीकी विकास, आर्थिक प्रक्रियाओं, राजनीतिक संस्थाओं, शिक्षा, संचार माध्यमों, वैश्वीकरण तथा सांस्कृतिक अंतःक्रियाओं के प्रभाव से निरंतर परिवर्तित होता रहता है। भारत का जनजातीय समाज भी इस परिवर्तन प्रक्रिया से अछूता नहीं रहा है। परंपरागत रूप से जनजातीय समुदायों की सामाजिक व्यवस्था प्रकृति, सामुदायिक जीवन, पारंपरिक संस्थाओं, स्थानीय अर्थव्यवस्था, सामूहिक संसाधनों और सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित रही है। आधुनिक राज्य, शिक्षा, बाजार, सड़क एवं संचार व्यवस्था, औद्योगीकरण, नगरीकरण, सरकारी योजनाओं, संवैधानिक प्रावधानों तथा वैश्वीकरण के विस्तार ने जनजातीय समाज की संरचना एवं संस्कृति में महत्वपूर्ण परिवर्तन उत्पन्न किए हैं।प्रस्तुत शोध-पत्र का मुख्य उद्देश्य जनजातीय समाज में हो रहे सामाजिक परिवर्तन का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करना है। इसमें सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा, प्रमुख समाजशास्त्रीय सिद्धांतों, जनजातीय सामाजिक संरचना तथा परिवर्तन के प्रमुख कारकों का विश्लेषण किया गया है। साथ ही परिवार, विवाह, नातेदारी, आर्थिक जीवन, शिक्षा, राजनीतिक सहभागिता, महिलाओं की स्थिति, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन तथा पारंपरिक संस्थाओं में आए परिवर्तनों को समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि जनजातीय समाज में परिवर्तन एक रैखिक प्रक्रिया नहीं है। इसमें परंपरा और आधुनिकता के बीच निरंतर अंतःक्रिया दिखाई देती है। एक ओर शिक्षा, राजनीतिक जागरूकता, स्वास्थ्य सुविधाएँ, संचार एवं आर्थिक अवसरों ने जनजातीय समुदायों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन उत्पन्न किए हैं, वहीं दूसरी ओर विस्थापन, भूमि से वंचित होना, सांस्कृतिक क्षरण, आर्थिक असमानता और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की समस्या जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। अतः जनजातीय समाज में सामाजिक परिवर्तन का अध्ययन केवल आधुनिकीकरण के संदर्भ में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक पहचान, अधिकार और विकास के व्यापक संदर्भ में किया जाना आवश्यक है।
Ce résumé expose les affirmations des auteurs. BNTIC ne l’interprète pas comme une validation indépendante des résultats.
Contrôle bibliographique ouvert
Institutions déclarées
Une affiliation ne permet pas de déduire la nationalité d’un auteur.